01/01/2026
नया साल शुरू हो रहा है और दुनिया अनजाने में एक ही सवाल पूछ रही है — तुम कहाँ पहुँचे?
fकिसी की रफ्तार तेज़ दिखती है, किसी का रास्ता ज़्यादा चमकदार लगता है, किसी का जीवन ज़्यादा “सही” दिखाई देता है, और यहीं से भीतर एक हल्की-सी बेचैनी जन्म लेती है — शायद मैं गलत दिशा में हूँ.
महाभारत में कृष्ण ने इस उलझन को युद्ध से बहुत पहले पहचान लिया था, और उन्होंने एक वाक्य में उसका समाधान दे दिया:
“स्वधर्मे निधनं श्रेयः, परधर्मो भयावहः.”
आज यह श्लोक तffलवारों की नहीं, बल्कि comparison की लड़ाई की बात करता है. परधर्म आज यह है कि किसी और की timeline अपनाई जाए, किसी और की सफलता को अपना लक्ष्य मान लिया जाए, किसी और की आवाज़ में अपने फैसले लिए जाएँ. और स्वधर्म? वह शोर नहीं करता. वह भीतर से बहुत धीरे-से कहता है. तू जहाँ है, वहीं से चल. नए साल की शुरुआत किसी तेज़ दौड़ से नहीं होती, बल्कि उस क्षण से होती है जब हम रुककर खुद से पूछते हैं — क्या मैं सच में अपना रास्ता चल रहा हूँ, या किसी और की गति को पकड़ने की कोशिश कर रहा हूँ? क्योंकि जिस दिन तुलना थमती है, उसी दिन दिशा साफ़ होने लगती है. तो इस साल की शुरुआत एक ईमानदार सवाल से कीजिए: अगर आज किसी और की ज़िंदगी देखना बंद कर दूँ, तो क्या मेरा रास्ता मुझे सही नहीं लगेगा?