04/02/2026
🌱 सुन्नी शब-ए-बराअत की मशहूर दुआ क्यों पढ़ते हैं 🌱
तर्जुमा:
🔺 यह मुबारक दुआ मुतअद्दिद सहाबा, ताबेईन और उल्मा से मर्वी है।
इसका यह मतलब हरगिज़ नहीं कि लौह-ए-महफ़ूज़ में लिखे हुए मुक़द्दर को बदला जा रहा हो,
बल्कि दुआ ख़ुद भी लौह-ए-महफ़ूज़ में लिखी हुई है।
यह दुआ दरअसल अल्लाह तआला के सामने इल्तिजा है और उस पर शक़ावत, महरूमी और फ़क़्र की हालत को मिटाने की शदीद ख़्वाहिश का इज़हार है।
हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसऊद रज़ियल्लाहु अन्हु फ़रमाते हैं:
“जिस बन्दे ने भी इन दुआओं के साथ दुआ की, अल्लाह तआला ने उसकी रोज़ी में वुसअत फ़रमा दी।”
♦️ इमाम बैहक़ी शाफ़ेई रहमतुल्लाहि अलैह इस दुआ के मआनी बयान करते हुए फ़रमाते हैं:
> اللهم إن كنتَ كتبتني أعملُ عملَ الأشقياء وحالي حال الفقراء بُرهة من دهري، فامحُ ذلك عني بإثبات عمل السعداء وحال الأغنياء ، واجعل خاتمة أمري سعيدًا موفقًا للخير
“ऐ अल्लाह! अगर तूने मेरे मुक़द्दर में मेरी उम्र के कुछ हिस्से में बदबख़्तों के आमाल और ग़रीबों की हालत लिख दी है,
तो उसे मिटा कर मेरे मुक़द्दर में नेक-बख़्तों के आमाल और दौलतमंदों की हालत साबित फ़रमा दे,
और मेरे अंजाम को ख़ैर व सआदत से हमकिनार फ़रमा।”
• [किताब ‘अल-क़दर’ लिल-बैहक़ी, सफ़्हा 215]
🔸 अल्लामा इब्ने अतिय्या मालिकी अलैहिर्रहमा फ़रमाते हैं:
> وهذا دعاء في غفران الذنوب وعلى جهة الجزع منها، أي: اللهم إن كنا شَقِينا بمعصيتك وكُتب علينا ذنوب وشقاوة بها فامحُها عنا بالمغفرة. وفي لفظ عُمر في بعض الروايات بعضٌ من هذا، ولم يكن دعاؤهما البتة في تبديل سابق القضاء
“यह गुनाहों की बख़्शिश की दुआ है और गुनाहों से सख़्त परेशानी का इज़हार है।
यानी:
ऐ अल्लाह! अगर हम तेरी नाफ़रमानी की वजह से बदबख़्त हुए हैं और हमारे आमालनामे में गुनाह और शक़ावत लिख दी गई है,
तो उसे बख़्शिश के ज़रिये हमसे मिटा दे।
▪️ हज़रत उमर रज़ियल्लाहु अन्हु की रिवायत के बाज़ अल्फ़ाज़ में भी कुछ इसी क़िस्म का मफ़हूम है, और उनकी दुआ हरगिज़ पहले से तयशुदा तक़दीर को बदलने के लिए नहीं थी।”
• [अल-मुहर्रिरुल वजीज़, जिल्द 3, सफ़्हा 317]
ाअत ‹𝟞›
#पन्द्रहवीं_शाबान
#दलाइल_मामूलात_अहले_सुन्नत