11/03/2026
अमेरिका की दादागिरी और इस्लामी कट्टरवाद: दुनिया के दो बड़े संकट
आज की दुनिया कई तरह की समस्याओं से जूझ रही है, लेकिन अगर गहराई से देखा जाए तो बहुत-सी वैश्विक समस्याओं के पीछे दो बड़ी शक्तियाँ अक्सर दिखाई देती हैं—एक तरफ इस्लामी कट्टरवाद और दूसरी तरफ अमेरिका की वैश्विक दखलअंदाजी। ये दोनों शक्तियाँ अलग-अलग भी हैं और कई बार एक-दूसरे के विरोध में भी खड़ी होती हैं, लेकिन इनके कारण दुनिया के कई हिस्सों में अस्थिरता और संघर्ष पैदा हुए हैं।
पिछले लगभग पचास वर्षों के इतिहास को देखें तो यह स्पष्ट दिखाई देता है कि अमेरिका ने दुनिया के अनेक देशों की राजनीति में सीधा या परोक्ष हस्तक्षेप किया है। कई विश्लेषकों का मानना है कि इस अवधि में अमेरिका ने लगभग सौ देशों में सत्ता परिवर्तन की कोशिशों में किसी न किसी रूप में भूमिका निभाई। यह हस्तक्षेप कभी सैन्य कार्रवाई के रूप में दिखाई दिया, तो कभी आर्थिक दबाव, कूटनीतिक रणनीति या गुप्त अभियानों के रूप में सामने आया।
भारत के आसपास के क्षेत्र में भी कई बार ऐसी आशंकाएँ और चर्चाएँ सामने आई हैं कि बाहरी शक्तियों ने यहाँ की राजनीति को प्रभावित करने की कोशिश की। नेपाल, बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान जैसे देशों में राजनीतिक अस्थिरता के दौर में अक्सर यह चर्चा होती रही है कि अंतरराष्ट्रीय शक्तियाँ अपने हितों के अनुसार परिस्थितियों को प्रभावित करने का प्रयास करती हैं। भले ही हर मामले में प्रत्यक्ष प्रमाण सामने न आएँ, लेकिन यह धारणा लंबे समय से विश्व राजनीति का हिस्सा रही है कि बड़ी शक्तियाँ अपने प्रभाव को बनाए रखने के लिए छोटे और कमजोर देशों की राजनीति में दखल देती हैं।
दूसरी ओर, इस्लामी कट्टरवाद भी आधुनिक दुनिया की एक गंभीर समस्या बनकर सामने आया है। कुछ कट्टरपंथी संगठनों ने धर्म के नाम पर हिंसा और आतंकवाद को बढ़ावा दिया है, जिससे न केवल निर्दोष लोगों की जान गई है बल्कि पूरे समाज में भय और अविश्वास का वातावरण भी बना है। इन संगठनों की गतिविधियों ने कई देशों की सुरक्षा और स्थिरता को प्रभावित किया है।
हालाँकि यह भी सच है कि किसी भी धर्म को कट्टरवाद से जोड़कर देखना उचित नहीं है। दुनिया के अधिकांश मुसलमान शांति और सह-अस्तित्व में विश्वास रखते हैं। समस्या उन छोटे लेकिन हिंसक समूहों की है जो अपने राजनीतिक या वैचारिक उद्देश्यों को हासिल करने के लिए धर्म का उपयोग करते हैं।
आज की स्थिति यह है कि एक तरफ अमेरिका जैसी महाशक्ति अपनी वैश्विक रणनीतियों और हितों के कारण कई क्षेत्रों में हस्तक्षेप करती हुई दिखाई देती है, और दूसरी ओर कट्टरपंथी संगठन हिंसा और आतंक के माध्यम से अपनी विचारधारा फैलाने की कोशिश करते हैं। जब ये दोनों शक्तियाँ टकराती हैं तो उसका सबसे बड़ा नुकसान आम लोगों को उठाना पड़ता है। युद्ध, आतंकवाद, आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता—इन सबका बोझ अंततः आम नागरिकों पर ही पड़ता है।
इसलिए आज दुनिया को सबसे अधिक आवश्यकता संतुलित दृष्टिकोण, संवाद और शांति की है। यदि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में प्रभुत्व की जगह सहयोग को महत्व दिया जाए और धर्म के नाम पर हिंसा फैलाने वालों को समाज से अलग किया जाए, तो शायद दुनिया एक अधिक सुरक्षित और स्थिर दिशा में आगे बढ़ सकेगी।
— रविंद्र कुमार की कलम से ✍️