11/06/2026
उत्तराखंड में कत्यूरी राजवंश के अनेकों स्मारक व मंदिर है परंतु पिछले 10 वर्ष से द्वाराहाट में 24 खंड की जाँच की जा रही है जिसमे कुटुंबरी देवी का मंदिर विशेष है!
लोकमान्यता व प्राचीन कथाओं की मानें तो चंद शासनकाल में द्वाराहाट क्षेत्र में बुजुर्ग महिला धान (चावल) कुटाई में निपुण थी। उसकी कोई संतान नहीं थी। बेसहारा थी लेकिन दानवीर और धार्मिक प्रवृत्ति वाली रही। धान कुटाई से जो धन एकत्र किया उससे आमा (दादी) ने एक मंदिर बनवाया, जिसे बाद में कुटुंबरी देवी मंदिर के रूप में प्रसिद्धि मिली। यह भी कथा है कि बुजुर्ग महिला जब स्वर्ग सिधार गई तो एक अन्य बेसहारा आमा ने भी इसी मंदिर में सेवादारी कर जीवन बिताया था।
16 वीं शताब्दी में बना ये मंदिर 1950-60 तक मौजूद था परंतु धीरे धीरे देखरेख ना होने वजह से मंदिर लुप्त हो गया!
कुटुंबरी देवी मंदिर अस्तित्व में ही नहीं है इसलिए कहना थोड़ा मुश्किल है। कहीं कहीं कटस्टोन लगे मिलते हैं। मंदिर अस्तित्व में न होने से लोगों ने घर बनाने में अवशेषों का इस्तेमाल किया ही होगा। पूर्व के सर्वे में हम उस स्थल तक पहुंच चुके, जहां मंदिर बताया जाता है।
कुटुंबरी देवी मंदिर का वजूद कब तक रहा, अब तक यही स्पष्ट नहीं हो सका है। बुजुर्ग किसी पुराने दौर में मंदिर होने का जिक्र जरूर करते थे। यह दावा करना गलत है कि मंदिर के अवशेष रूपी पत्थर व अन्य सामग्री गांव के घरों में इस्तेमाल की गई है। पूरा द्वाराहाट स्थापत्यकला की दृष्टि से बहुत समृद्ध रहा है। कत्यूरकालीन मंदिरों में प्रयुक्त पत्थरों जैसे पाषाणखंड जहां तहां बिखरे पड़े हैं। चांचरी यानि चंद्रपर्वत से ही कत्यूरकालीन मंदिरों के निर्माण को पत्थर निकाले गए थे। कालांतर में द्वाराहाट क्षेत्रवासियों ने भी अपने घरों के निर्माण में इसी चंद्रपर्वत के पत्थरों का उपयोग किया था। लिहाजा दोनों समानता होना स्वाभाविक है।
भारतीय पुरातत्व विभाग व उत्तराखंड सरकार मिलकर इस पौराणिक मंदिर को वापस इस्थापित करने के लिए पुरजोर कोशिश में लगी है!
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