26/07/2025
कहानी का नाम: "नदी किनारे की वो सुबह"
एक बार की बात है, पहाड़ों के बीच एक छोटा सा गाँव था – नाम था धरतीपुर। यहाँ के बच्चे बहुत खुशमिजाज थे। गाँव के पास ही एक नन्ही सी नदी बहती थी – बिल्कुल चाँदी जैसी चमकती और चुपचाप गुनगुनाती हुई।
एक दिन सूरज की पहली किरण जैसे ही पहाड़ों की चोटियों से टकराई, चार दोस्त – गुड्डू, माया, चिंटू और परी – अपने छोटे-छोटे थैले लेकर निकल पड़े नदी किनारे खेलने।
"आज हम किले बनाएंगे!" चिंटू ने उत्साह से कहा।
नदी के किनारे रेत और पत्थरों से बच्चों ने मिलकर एक खूबसूरत किला बनाया – उसमें छोटी सुरंगें, झरोखे, और एक झंडा भी था जो गुड्डू की रूमाल से बना था।
तभी परी ने देखा – एक नन्हा सा कछुआ रेत पर धीरे-धीरे रेंग रहा था। सब बच्चे चौंक गए।
"चलो इसे घर वापिस पहुँचाते हैं!" माया बोली।
बच्चों ने कछुए को बहुत प्यार से उठाया और धीरे-धीरे नदी की ओर ले गए। उन्होंने कछुए को पानी में छोड़ते हुए कहा, "जा छोटे दोस्त, अब तेरा घर यहीं है।"
कछुआ जैसे मुस्कुरा कर सबको धन्यवाद कह गया। सूरज अब ऊँचा चढ़ चुका था, बच्चे थक गए थे लेकिन उनके दिल खुश थे।
जब वे गाँव लौटे, तो उनके चेहरे पर एक अलग ही चमक थी – जैसे उन्होंने आज कुछ बहुत अच्छा किया हो।
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सीख:
प्रकृति के साथ खेलना हमें सिखाता है दोस्ती, करुणा और जिम्मेदारी।
अगर तुम चाहो, मैं इस कहानी को कविता या चित्र पुस्तक के रूप में भी बना सकता हूँ!