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MySher Sher or Shayari Collection

ऐसे बहुत से शायर हैं, जिनके शेर का दूसरा मिसरा (line) इतना मशहूर हुआ कि लोग पहले मिसरे (line) को तो भूल ही गये। ऐसे ही। ...
11/12/2019

ऐसे बहुत से शायर हैं, जिनके शेर का दूसरा मिसरा (line) इतना मशहूर हुआ कि लोग पहले मिसरे (line) को तो भूल ही गये। ऐसे ही। चन्द उदाहरण यहाँ पेश हैं:

"ऐ सनम वस्ल की तदबीरों से क्या होता है??
*वही होता है जो मंज़ूर-ए-ख़ुदा होता है।*"

*- मिर्ज़ा रज़ा बर्क़*

"भाँप ही लेंगे इशारा सर-ए-महफ़िल जो किया,
*ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं।"*

*- माधव राम जौहर*

"चल साथ कि हसरत दिल-ए-मरहूम से निकले,
*आशिक़ का जनाज़ा है, ज़रा धूम से निकले।"*

*- मिर्ज़ा मोहम्मद अली फ़िदवी*

"दिल के फफोले जल उठे सीने के दाग़ से,
*इस घर को आग लग गई, घर के चराग़ से।"*

*- महताब राय ताबां*

"ईद का दिन है, गले आज तो मिल ले ज़ालिम,
*रस्म-ए-दुनिया भी है,मौक़ा भी है, दस्तूर भी है।"*

*- क़मर बदायूंनी*

"क़ैस जंगल में अकेला ही मुझे जाने दो,
*ख़ूब गुज़रेगी, जो मिल बैठेंगे दीवाने दो।"*

*- मियाँ दाद ख़ां सय्याह*

'मीर' अमदन भी कोई मरता है?
*जान है तो जहान है प्यारे।"*

*- मीर तक़ी मीर*

"शब को मय ख़ूब पी, सुबह को तौबा कर ली,
*रिंद के रिंद रहे हाथ से जन्नत न गई।"*

*- जलील मानिकपुरी*

"शहर में अपने ये लैला ने मुनादी कर दी,
*कोई पत्थर से न मारे मेंरे दीवाने को।"*

*- शैख़ तुराब अली क़लंदर काकोरवी*

"ये जब्र भी देखा है तारीख़ की नज़रों ने,
*लम्हों ने ख़ता की थी, सदियों ने सज़ा पाई।"*

*- मुज़फ़्फ़र रज़्मी*

01/12/2016

ਧੁੱਪ ਸੂਰਜ ਦੀ - ਸੁਰਜੀਤ ਪਾਤਰ
ਧੁੱਪ ਸੂਰਜ ਦੀ ਦਿਖਾਵੇ ਹੋਰ ਰਾਹ
ਚਾਨਣੀ ਵਿਚ ਹੋਰ ਰਸਤੇ ਚਮਕਦੇ
ਹੋਰ ਮੰਜ਼ਿਲ ਦੱਸਦਾ ਘਰ ਦਾ ਚਿਰਾਗ਼
ਸਿਵਿਆਂ ਲੋਏ ਹੋਰ ਪਗ-ਚਿੰਨ੍ਹ ਸੁਲਗਦੇ
ਇਹ ਸਿਵਾ, ਇਹ ਚੰਨ, ਸੂਰਜ, ਇਹ ਚਿਰਾਗ਼
ਵੱਖੋ ਵੱਖਰੇ ਰਸਤਿਆਂ ਵੱਲ ਖਿੱਚਦੇ
ਮੈਂ ਚੁਰਾਹੇ 'ਤੇ ਖੜਾ ਹਾਂ ਸੋਚਦਾ
ਕਿੰਨੇ ਟੋਟੇ ਕਰ ਦਿਆਂ ਇਕ ਹੋਂਦ ਦੇ
ਐ ਮਨਾ ਤੂੰ ਬੇਸੁਰਾ ਏਂ ਸਾਜ਼ ਕਿਉਂ
ਏਨੀ ਗੰਧਲੀ ਹੈ ਤੇਰੀ ਆਵਾਜ਼ ਕਿਉਂ
ਸੁਰ ਨਹੀਂ ਹੁੰਦਾ ਤੂੰ ਕਿਉਂ ਕੀ ਗੱਲ ਹੈ
ਇਲਮ ਦੇ ਮਸਲੇ ਨੇ ਜਾ ਇਖ਼ਲਾਕ ਦੇ
ਮਨ ਹੈ ਇਕ ਪੁਸਤਕ ਜਿਵੇਂ ਲਿਖ ਹੋ ਰਹੀ
ਜਿਸ ਦਾ ਕੋਈ ਆਦ ਹੈ ਨਾ ਅੰਤ ਹੈ
ਇਕ ਇਬਾਰਤ ਹੈ ਜੋ ਅੰਦਰ ਤੜਪਦੀ
ਵਾਕ ਨੇ ਇਕ ਦੂਸਰੇ ਨੂੰ ਕੱਟਦੇ

01/12/2016

ਕੁਛ ਕਿਹਾ................. - ਸੁਰਜੀਤ ਪਾਤਰ
ਕੁਛ ਕਿਹਾ ਤਾਂ ਹਨੇਰਾ ਜਰੇਗਾ ਕਿਵੇਂ
ਚੁਪ ਰਿਹਾ ਤਾਂ ਸ਼ਮਾਦਾਨ ਕੀ ਕਹਿਣਗੇ
ਗੀਤ ਦੀ ਮੌਤ ਇਸ ਰਾਤ ਜੇ ਹੋ ਗਈ
ਮੇਰਾ ਜੀਣਾ ਮੇਰੇ ਯਾਰ ਕਿੰਜ ਸਹਿਣਗੇ
ਇਸ ਅਦਾਲਤ ‘ਚ ਬੰਦੇ ਬਿਰਖ ਹੋ ਗਏ
ਫੈਸਲੇ ਸੁਣਦਿਆਂ ਸੁਣਦਿਆਂ ਸੁਕ ਗਏ
ਆਖੋ ਏਨਾਂ ਨੂੰ ਉਜੜੇ ਘਰੀਂ ਜਾਣ ਹੁਣ
ਇਹ ਕਦੋਂ ਤੀਕ ਏਥੇ ਖੜ੍ਹੇ ਰਹਿਣਗੇ
ਯਾਰ ਮੇਰੇ ਜੋ ਇਸ ਆਸ ਤੇ ਮਰ ਗਏ
ਕਿ ਮੈਂ ਉੱਨਾਂ ਦੇ ਦੁੱਖ ਦਾ ਬਣਾਵਾਂਗਾ ਗੀਤ
ਜੇ ਮੈਂ ਚੁਪ ਹੀ ਰਿਹਾ ਜੇ ਮੈਂ ਕੁਛ ਨਾ ਕਿਹਾ
ਬਣ ਕੇ ਰੂਹਾਂ ਸਦਾ ਭਟਕਦੇ ਰਹਿਣਗੇ
ਜੋ ਬਦੇਸ਼ਾਂ ‘ਚ ਰੁਲ਼ਦੇ ਨੇ ਰੋਜ਼ੀ ਲਈ
ਉਹ ਜਦੋਂ ਦੇਸ ਪਰਤਣਗੇ ਆਪਣੇ ਕਦੀ
ਕੁਝ ਤਾਂ ਸੇਕਣਗੇ ਮਾਂ ਦੇ ਸਿਵੇ ਦੀ ਅਗਨ
ਬਾਕੀ ਕਬਰਾਂ ਦੇ ਰੁੱਖ ਹੇਠ ਜਾ ਬਹਿਣਗੇ
ਕੀ ਇਹ ਇਨਸਾਫ ਹਉਮੈ ਦੇ ਪੁੱਤ ਕਰਨਗੇ
ਕੀ ਇਹ ਖਾਮੋਸ਼ ਪੱਥਰ ਦੇ ਬੁੱਤ ਕਰਨਗੇ
ਜੋ ਸਲੀਬਾਂ ਤੇ ਟੰਗੇ ਨੇ ਲੱਥਣੇ ਨਹੀਂ
ਰਾਜ ਬਦਲਣੇ ਸੂਰਜ ਚੜਣ ਲਹਿਣਗੇ
ਇਹ ਜੋ ਰੰਗਾਂ ‘ਚ ਚਿਤਰੇ ਨੇ ਖੁਰ ਜਾਣਗੇ
ਇਹ ਜੋ ਮਰਮਰ ‘ਚ ਉਕਰੇ ਨੇ ਮਿਟ ਜਾਣਗੇ
ਬਲਦੇ ਹੱਥਾਂ ਨੇ ਜਿਹੜੇ ਹਵਾ ਵਿਚ ਲਿਖੇ
ਹਰਫ ਉਹੀ ਹਮੇਸ਼ਾ ਲਿਖੇ ਰਹਿਣਗੇ
ਇਹ ਵੀ ਸ਼ਾਇਦ ਮੇਰਾ ਆਪਣਾ ਵਹਿਮ ਹੈ
ਕੋਈ ਦੀਵਾ ਜਗੇਗਾ ਮੇਰੀ ਕਬਰ ਤੇ
ਜੇ ਹਵਾ ਇਹ ਰਹੀ ਕਬਰਾਂ ਉਤੇ ਤਾਂ ਕੀ
ਸਭ ਘਰਾਂ ‘ਚ ਵੀ ਦੀਵੇ ਬੁਝੇ ਰਹਿਣਗੇ

01/12/2016

जरुर पढ़े और शेअर भी करें

ਮੰਦਿਰੋਂ ਮੇਂ ਦਾਨਾ ਚੁਗ਼ਕਰ ਚਿੜੀਅਾਂ "ਮਸਜਿਦ" ਮੇਂ ਪਾਨੀ ਪੀਤੀ ਹੈਂ ,
ਮੈਨੇਂ ਸੁਨਾ "ਰਾਧਾ" ਕੀ ਚੁਨਰੀ ਕੋੲੀ "ਸਲਮਾ" ਬੇਗ਼ਮ ਸੀਤੀ ਹੈ ,
ੲੇਕ "ਰਫ਼ੀ" ਥਾ ਮਹਿਫ਼ਿਲ ਮਹਿਫ਼ਿਲ "ਰਘੂਪਤੀ ਰਾਘਵ" ਗਾਤਾ ਥਾ,
ੲੇਕ " ਪ੍ਰੇਮਚੰਦ" ਬੱਚੋਂ ਕੋ "ੲੀਦਗਾਹ" ਸੁਨਾਤਾ ਥਾ,
ਕਭੀ "ਕਨਹੈਅਾ" ਕੀ ਮਹਿਮਾ ਗਾਤਾ "ਰਸਖਾਨ" ਸੁਨਾੲੀ ਦੇਤਾ ਥਾ ,
ਅੌਰੋਂ ਕੋ ਦਿਖਤੇ ਹੋਂਗੇ "ਹਿੰਦੂ" ਅੌਰ "ਮੁਸਲਮਾਨ",
ਮੁਝੇ ਤੋ ਹਰ ਸ਼ਖਸ ਕੇ ਭੀਤਰ ੲਿਨਸਾਨ ਦਿਖਾੲੀ ਦੇਤਾ ਹੈ ,
ਕਿੳੁਂਕਿ ਨਾ "ਹਿੰਦੂ" ਬੁਰਾ ਹੈ ਨਾ "ਮੁਸਲਮਾਨ"...
ਜਿਸਕਾ ਕਿਰਦਾਰ ਬੁਰਾ ਹੈ ,
ਵੋ ੲਿਨਸਾਨ ਬੁਰਾ ਹੈ.....

"मंदिर"में दाना चुगकर चिड़ियां "मस्जिद" में पानी पीती हैं
मैंने सुना है "राधा" की चुनरी
कोई "सलमा"बेगम सीती हैं
एक "रफी" था महफिल महफिल "रघुपति राघव" गाता था
एक "प्रेमचंद" बच्चों को
"ईदगाह" सुनाता था
कभी "कन्हैया"की महिमा गाता
"रसखान" सुनाई देता है
औरों को दिखते होंगे "हिन्दू" और "मुसलमान"
मुझे तो हर शख्स के भीतर "इंसान"
दिखाई देता है...
क्योंकि...
ना हिंदू बुरा है ना मुसलमान बुरा है
जिसका किरदार बुरा है वो इन्सान बुरा है...
.......... ...........( ਅਗਿਅਾਤ/अज्ञात )

29/08/2016

मनुष्यता -मैथिलीशरण गुप्त

विचार लो कि मत्र्य हो न मृत्यु से डरो कभी¸
मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करे सभी।
हुई न यों सु–मृत्यु तो वृथा मरे¸ वृथा जिये¸
मरा नहीं वहीं कि जो जिया न आपके लिए।
यही पशु–प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।
उसी उदार की कथा सरस्वती बखानवी¸
उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती।
उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती;
तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती।
अखण्ड आत्मभाव जो असीम विश्व में भरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिये मरे।।
सहानुभूति चाहिए¸ महाविभूति है वही;
वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही।
विरूद्धवाद बुद्ध का दया–प्रवाह में बहा¸
विनीत लोक वर्ग क्या न सामने झुका रहे?
अहा! वही उदार है परोपकार जो करे¸
वहीं मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।
अनंत अंतरिक्ष में अनंत देव हैं खड़े¸
समक्ष ही स्वबाहु जो बढ़ा रहे बड़े–बड़े।
परस्परावलम्ब से उठो तथा बढ़ो सभी¸
अभी अमत्र्य–अंक में अपंक हो चढ़ो सभी।
रहो न यों कि एक से न काम और का सरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।
"मनुष्य मात्र बन्धु है" यही बड़ा विवेक है¸
पुराणपुरूष स्वयंभू पिता प्रसिद्ध एक है।
फलानुसार कर्म के अवश्य बाह्य भेद है¸
परंतु अंतरैक्य में प्रमाणभूत वेद हैं।
अनर्थ है कि बंधु हो न बंधु की व्यथा हरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।
चलो अभीष्ट मार्ग में सहर्ष खेलते हुए¸
विपत्ति विप्र जो पड़ें उन्हें ढकेलते हुए।
घटे न हेल मेल हाँ¸ बढ़े न भिन्नता कभी¸
अतर्क एक पंथ के सतर्क पंथ हों सभी।
तभी समर्थ भाव है कि तारता हुआ तरे¸
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।
रहो न भूल के कभी मदांध तुच्छ वित्त में
सन्त जन आपको करो न गर्व चित्त में
अन्त को हैं यहाँ त्रिलोकनाथ साथ में
दयालु दीन बन्धु के बडे विशाल हाथ हैं
अतीव भाग्यहीन हैं अंधेर भाव जो भरे
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।

14/08/2016

चुभता तो बहुत कुछ मुझको भी है तीर की तरह ..
मगर खामोश रहता हूँ , अपनी तकदीर की तरह ..

23/07/2016

तासीर किसी भी दर्द की मीठी नहीं होती
यही वजह है की आंसू नमकीन होते है ।

21/01/2016

बेवजह की बातों मे उलझाकर
दोस्तों
हमने देखा था जी भर के उसे.....

17/01/2016

Quote of the Day

You will make your conflicts disappear when you understand them in their ultimate root, not when you want to resolve them. ~ Silo

17/01/2016

नौजवान और देशभक्त इसे जरुर पढ़े

नौजवानों / अज्ञात रचनाकार=========== रचनाकाल: सन 1930

सूखा नहीं था ख़ून शहीदों का दार से,
ताज़ा था दिल का ज़ख़्म, अभी उनके वार से।

लो उसके और क़त्ल का फ़रमान कर दिया,
ज़ख़्मी जिगर के सोज़ का सामान कर दिया।

बातों में जिनके साथ में, रातों जमा किए,
उन सबको छोड़ बैठा हूं भारत के वास्ते।

पर वह रसम के वास्ते छोड़े न जाएंगे।
हाथों से टांके ज़ख़्म के, तोड़े न जाएंगे।

किस जगह मजनूं हो, फ़रहाद कहां हो देखो,
ओ अहिंसा के पुजारी! यह सभा तो देखो।

जानदारों से फ़क़त होती मुहब्बत तुमको,
प्रेम मस्तानों का अंदाज़े-रवां तो देखो।

रस्सियांे से गले मिलने को बढ़े जाते हैं,
ख़ुद-ब-ख़ुद गोद में सूली के, चढ़े जाते हैं।

बन करके अश्क दर्दे-मुहब्बत न जाएगा,
भारत के हर जवान को हरकत में लाएगा।

बरतानियों को ख़ून के आंसू रुलाएगा,
गिन-गिन के अब हर एक का बदला चुकाएगा।

पाबंद हिंद दम व दिलासा नहीं रहा,
कालों से छेड़ करना तमाशा नहीं रहा।

हां ऐ जवाने-मुल्क, ज़रा मैं भी देख लूं,
लाता है रंग कैसा भगतसिंह का ये ख़ूं।

सुखदेव, राजगुरु से तुम्हें कितना प्यार है,
यह शोर इक़बाल का ढाता है क्या जुनूं।

देखूंगा मैं इसे भी कि बदला है क्या लिया,
उस रोज़ गै़र पढ़ते हैं किस-किस का मर्सिया।

17/01/2016

भारत रत्न पूज्य श्री अटल बिहारी वाजपेयी की
"आतंकवाद के बारे में पीड़ा"

ख़ून क्यों सफ़ेद हो गया?
भेद में अभेद खो गया।
बँट गये शहीद, गीत कट गए,
कलेजे में कटार दड़ गई।
दूध में दरार पड़ गई।

खेतों में बारूदी गंध,
टूट गये नानक के छंद
सतलुज सहम उठी, व्यथित सी बितस्ता है।
वसंत से बहार झड़ गई
दूध में दरार पड़ गई।

अपनी ही छाया से बैर,
गले लगने लगे हैं ग़ैर,
ख़ुदकुशी का रास्ता, तुम्हें वतन का वास्ता।
बात बनाएँ, बिगड़ गई।
दूध में दरार पड़ गई।

17/01/2016

बाधाएँ आती हैं आएँ
घिरें प्रलय की घोर घटाएँ,
पावों के नीचे अंगारे,
सिर पर बरसें यदि ज्वालाएँ,
निज हाथों में हँसते-हँसते,
आग लगाकर जलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

हास्य-रूदन में, तूफ़ानों में,
अगर असंख्यक बलिदानों में,
उद्यानों में, वीरानों में,
अपमानों में, सम्मानों में,
उन्नत मस्तक, उभरा सीना,
पीड़ाओं में पलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

उजियारे में, अंधकार में,
कल कहार में, बीच धार में,
घोर घृणा में, पूत प्यार में,
क्षणिक जीत में, दीर्घ हार में,
जीवन के शत-शत आकर्षक,
अरमानों को ढलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

सम्मुख फैला अगर ध्येय पथ,
प्रगति चिरंतन कैसा इति अब,
सुस्मित हर्षित कैसा श्रम श्लथ,
असफल, सफल समान मनोरथ,
सब कुछ देकर कुछ न मांगते,
पावस बनकर ढ़लना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।

कुछ काँटों से सज्जित जीवन,
प्रखर प्यार से वंचित यौवन,
नीरवता से मुखरित मधुबन,
परहित अर्पित अपना तन-मन,
जीवन को शत-शत आहुति में,
जलना होगा, गलना होगा।
क़दम मिलाकर चलना होगा।
भारत रत्न पूज्य श्री अटल बिहारी वाजपेयी

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