Nandini Fashion

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03/09/2022

वाकिंग करिये
वजन ना उठाएं
ख़ुश रहिये
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30/08/2022

॥श्री गणेशाय नमः।। ॥ॐ श्री सिद्धिविनायक नमो नमः॥

॥वक्रतुंड महाकाय सुर्य कोटी समप्रभ॥
॥निर्विघ्नं कुरुम देवे सर्व कार्येशु सर्वदा॥

आप सभी भक्तो को
" सनातन धर्म हिन्दू धर्म "
परिवार के तरफ से हमारे आराध्य देव
🙏श्री गजानन गणपती बप्पा🙏
के चतुर्थी उत्सव कि हार्दिक शुभेच्छा ,,
वीघ्नहर्ता हम शभि के वीघ्न को दुर करे
श्री गजानन लम्बोदर महाराज श्री गणपती भगवान कि जय 🙌🙌🙌🙌

सनातन धर्म हिन्दू धर्म
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🙏🙏🙏🙏🙏🙏

23/08/2022

विकाश दिव्यकृति 🙏

23/08/2022
21/08/2022

🚩🚩श्रील प्रभुपाद (इस्कॉन फाउंडर आचार्य)🚩🚩

एक ऐसा भारतीय सन्यासी जिन्होंने पाकिस्तान में 12 मंदिर बनवा दिए।

एक ऐसा सन्यासी जिन्होंने मात्र 12 वर्ष में 15 बार पूरी पृथ्वी का भ्रमण किया।

एक ऐसा सन्यासी जिन्होंने 70 वर्ष की उम्र में अमेरिका में जाकर दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक संस्था इस्कान की स्थापना की।

एक ऐसा सन्यासी जिसके नाम दुनिया में सबसे ज्यादा भागवत गीता बाँटने का रिकॉर्ड है।

एक ऐसा सन्यासी जिन्होंने दुनिया में सबसे ज्यादा विदेशियों को सनातन धर्म से जोड़ने का रिकॉर्ड बनाया।

एक ऐसा सन्यासी जिन्होंने मृत्यु के अंतिम क्षणों में भगवत गीता का श्लोक का इंग्लिश में ट्रांसलेट करते करते प्राण त्याग दिया।

एक ऐसा सन्यासी जिन्होंने दुनिया में सबसे पहले रथयात्रा निकालने की परंपरा शुरू की।

एक ऐसा भारतीय सन्यासी जिन्होंने सभी विदेशियों को शुद्ध शाकाहारी बना दिया और हरे कृष्ण महामंत्र... जाप करने में लगा दिया।

एक ऐसा सन्यासी जिन्होंने चार नियम पालन करने को कहा, वो चार नियम पालन करके कोई भी श्रीला प्रभुपाद का शिष्य अभी भी बन सकता है ये प्रभुपाद खुद बोल कर गए हैं...

ये चार नियम ये हैं 👇👇

1. 16 माला नित्य हरि नाम जाप। (हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे) ये हरिनाम जपना नित्य 16 माला।

2. शुद्ध शाकाहारी रहना। लहसुन, प्याज, मांस, मछली, अंडा, जीव हत्या बंद करो...

3. पर पुरुष/ पर स्त्री गमन का त्याग।

4. जुआ न खेलना... किसी भी प्रकार का नशा का त्याग, मदिरा, चाय, कॉफ़ी, गुटका, बीड़ी, सिगरेट जितना भी नशा है सब त्याग करो।

एक ऐसा सन्यासी जिन्होंने करोड़ों अरबों की धार्मिक संपत्ति पत्नी, बच्चों, भाई के नाम न करके इस्कान के नाम कर दिया, जिसको दुनिया के 12 अलग-अलग देशों के 12 दीक्षित सन्यासी फाउंडर बनकर चलाएंगे।

हरे कृष्ण!

हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।।
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🙏🙏🙏🙏🙏

19/08/2022

💞💜 श्रीकृष्ण_जन्म 💜💞

अश्रुओं में डूब चुकी आंखों से पति की ओर कातर दृष्टि फिराते हुए देवकी ने पूछा, क्या इसकी भी वही दशा होगी ? वह नीच क्या इसे भी वैसे ही मार देगा जैसे हमारे उन बच्चों को मार दिया था.. लम्बे समय से बन्दीगृह की पीड़ा भोगते वसुदेव के झुर्रीदार चेहरे पर जाने कैसा तेज उभर आया। बोले, "इसके लिए इसके सात भाइयों ने अपनी बलि दी है देवकी! कंस क्या, स्वयं ईश्वर इसका अहित नहीं कर सकते..."

किन्तु सूर्योदय होते ही उस दुष्ट को इसके जन्म का समाचार मिल जाएगा स्वामी! फिर वह.. सूर्योदय में बहुत समय है देवकी! तुम इसे मुझे दो। सारे द्वार खुले हुए हैं और सारे सैनिक सो रहे हैं। बाहर भादो के मेघ तांडव कर रहे हैं। नियति स्वयं इसकी रक्षा कर रही है। मैं शीघ्र इसे किसी सुरक्षित स्थान पर पहुँचा आऊंगा। वसुदेव के अंदर अद्भुत साहस उत्पन्न हो गया था। होता क्यों न, उनके कुल में "श्रीकृष्ण" जो जन्म ले के आये थे।

तो क्या इसे त्याग देना होगा? यह हमारी समूची तपस्या का फल है स्वामी... हमारे जीवन और इस संसार में शान्ति की एकमात्र आशा! इसे भी त्याग दूँ तो मेरी झोली में शेष क्या बचेगा?" देवकी को कुछ सूझ नहीं रहा था।... त्याग तो करना ही पड़ेगा देवकी! इस युग का भविष्य तुम्हारे त्याग पर ही टिका है। जब कोई देवकी अपने सात पुत्रों का बलिदान और आठवें का वियोग स्वीकारती है, तभी सभ्यता को उद्धारक मिलता है। शीघ्रता करो, नियति किसी को भी अधिक समय नहीं देती, किसी कार्य में हुई क्षण भर की देरी भी युगों का भविष्य बदल देती है। तुम इसे मुझे दो, मैं इसे गोकुल में नन्द के यहाँ पहुँचा कर आता हूँ। कहते कहते वसुदेव ने इधर उधर दृष्टि घुमाई, उन्हें एक खाली टोकरी दिखी। उठा लाये.. बाहर तेज बरसात हो रही है, और गोकुल के मार्ग में यमुना भी आती हैं। इस अंधेरी रात में आप इसे लेकर यमुना पार कैसे जा पाएंगे स्वामी ? देवकी एक माँ और एक पत्नी थीं, उनका वात्सल्य भय बन कर उभर रहा था।

वसुदेव पिता थे, उनका वात्सल्य उन्हें भयमुक्त हो कर पिता का कर्तव्य निभाने को प्रेरित कर रहा था। बोले, पिता हूँ देवकी! वह जगतपिता इस पिता की प्रतिष्ठा नहीं जाने देगा। प्रलय आ जाय तब भी अपने पुत्र को सुरक्षित पहुँचा दूंगा। इसकी रक्षा के लिए मुझे हजार बार अपने प्राण अर्पण करने पड़े तब भी पीछे नहीं हटूंगा।

देवकी की गोद में उनका वह आठवां पुत्र था, जिसके सम्बन्ध में वे भी जानती थीं कि वही उनका और युग का उद्धार करेगा। उस पुत्र को अपनी गोद से दूर करने के बारे में वे सोच भी नहीं पा रही थीं। वसुदेव ने फिर कहा, कठोर होवो देवकी! अस्थिर चरित्र वाले लोग अपने साथ साथ समूची संस्कृति का अहित करते हैं। जो लोग विपत्ति के क्षणों में अपना धर्मानुकूल पथ निर्धारित नहीं कर पाते, वे सभ्यता के घाती होते हैं। यह बालक केवल तुम्हारा नहीं, हमारे समय की धरोहर है। केवल अपनी भावनाओं की मत सुनो, प्रजा की सोचो। सभ्यता पर आयी विपत्ति को भी केवल अपने सुखों की सोच कर अनदेखा कर जाने वाले लोग युग के द्रोही होते हैं देवकी! तुम्हे इस बालक का त्याग करना ही होगा, यही इस समय तुम्हारा कर्तव्य है...

देवकी ने एक बार कातर दृष्टि से देखा आपने आठवें पुत्र को, फिर चुपचाप उसे पति को दे दिया। वसुदेव बालक को ले कर निकल गए। द्वापर युग अब यही से बदलना शुरू हुआ।... "इसलिए भजों रे मन गोविंदा.."

❤️ 𝑹𝒂𝒅𝒉𝒆 𝑲𝒓𝒊𝒔𝒉𝒏𝒂 ❤️
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17/08/2022

ऐसी सत्य घटना साझा कर सकते हैं, जिसे पढ़ते ही हृदय भगवान के लिए व्याकुल हो जाये?
दिनांक: 1 नवंबर 1979।

समय: रात्रि 1 बजे।
स्थान: तिरुपति मंदिर।

पूरा तिरुपति शहर और स्वयं भगवान श्रीमन्नारायण भी शयन कर रहे थे और घनघोर शांत रात्रि थी की इतने में ही…
ठंन्न ठंन्न ठंन्न ठंन्न!

तिरुपति मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर के श्रीविग्रह के ठीक आगे जो बड़ा सा घंट है वो अपने आप हिलने लगा और उस घंट नाद से पूरा तिरुपति शहर एकदम आश्चर्य में भरकर उठ खड़ा हुआ।

मंदिर रात्रि 12 बजे पूर्ण रूप से बंद हो गया था, फिर ये कैसी घंटा नाद की ध्वनि आ रही है?
कोई भी जीवित व्यक्ति मंदिर में रात्रि 12 के बाद रहना संभव नही, तो फिर किसने ये घंटा नाद किया?
कोई जीव-जंतु मंदिर में प्रवेश नही कर सकते क्योंकि सारे द्वार बंद है, तो फिर ये कौन है?
मंदिर के मुख्य कार्यकारी अधिकारी श्री पी वी आर के प्रसाद के नेत्रो में अश्रु थे क्योंकि केवल वे जान पा रहे थे कि ये केवल घंटा नाद नही है, ये भगवान ने अपना संकेत दे दिया है मेरे "वरुण जाप" की सफलता के लिए।

भगवान् के सभी भक्त यह घटना बड़ी श्रद्धा से पढ़ें :-

यह अलौकिक दिव्य चमत्कारी घटना सन् 1979 नवंबर माह की हैं।

सन् 1979 में तिरुपति क्षेत्र में भयंकर सूखा पडा। दक्षिण-पूर्व का मानसून पूरी तरह विफल हों गया था। गोगर्भम् जलाशय (जो तिरुपति में जल-आपूर्ति का प्रमुख स्त्रोत हैं) लगभग सूख चुका था। आसपास स्थित कुँए भी लगभग सूख चुके थे।

तिरुपति ट्रस्ट के अधिकारी बड़े भारी तनाव में थे। ट्रस्ट अधिकारियों की अपेक्षा थी की सितम्बर-अक्टूबर की चक्रवाती हवाओं से थोड़ी-बहुत वर्षा हों जाएगी किन्तु नवम्बर आ पहुंचा था। थोडा-बहुत , बस महीने भर का पानी शेष रह गया था। मौसम विभाग स्पष्ट कर चुका था की वर्षा की कोई संभावना नहीं हैं।

सरकारें हाथ खड़ी कर चुकीं थीं। ट्रस्ट के सामने मन्दिर में दर्शन निषेध करने के अतिरिक्त अन्य कोई विकल्प नहीं बचा था। दर्शन निषेध अर्थात् दर्शन-पूजन अनिश्चित् काल के लिए बन्द कर देना।

ट्रस्टीयों की आत्मा स्वयं धिक्कार रही थी की कैसे श्रद्धालुओं को कह पायेंगे की जल के अभाव के कारण देवस्थान में दर्शन प्रतिबंधित कर दिए गए हैं? किन्तु दर्शन बंद करने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं बचा था।

विधर्मियों और मूर्तिपूजन के विरोधियों का आनन्द अपने चरम पर था। नास्तिक लोग मारे ख़ुशी के झूम रहे थे। अखबारों में ख़बरें आ रही थी की जो भगवान् अपने तीर्थ में जल-आपूर्ति की व्यवस्था नहीं कर सकते वो भगवद्भक्तमण्डल पर कृपा कैसे करेंगे?

सनातन धर्मानुयायियों को खुलेआम अन्धविश्वासी और सनातन धर्म को अंधविश्वास कहा जा रहा था।

श्रद्धालु धर्मानुयायी रो रहे थे , उनके आंसू नहीं थम रहे थे!
कुछ दिन और निकल गए किन्तु जल-आपूर्ति की कोई व्यवस्था नहीं।

अचानक घबराए हुए ट्रस्टीयों को कुछ बुद्धि आई और उन्होंने वेदों और शास्त्रों के धुरन्धर विद्वान् और तिरुपति ट्रस्ट के सलाहकार , 90 वर्षीय श्री उप्पुलरी गणपति शास्त्री जी महाराज से सम्पर्क किया।

ट्रस्टीयों ने महाराजश्री से पूछा की क्या वेदों और शास्त्रों में इस गंभीर परिस्थिति का कोई उपाय हैं?

श्री उप्पुलरी गणपति शास्त्री जी महाराज ने उत्तर दिया की वेदों और शास्त्रों में इस लोक की और अलौकिक समस्त समस्याओं का निदान हैं। महाराजश्री ने ट्रस्टीयों को “वरुण जप” करने का परामर्श दिया।

महाराजश्री ने ट्रस्टीयों को बता दिया की पूर्ण समर्पण , श्रद्धा और विश्वास से यदि अनुष्ठान किया जाए तभी अनुष्ठान फलीभूत होगा अन्यथा नहीं। श्रद्धा में एक पैसेभर की कमी पूरे अनुष्ठान को विफल कर देगी।

ट्रस्टीयों ने “वरुण जाप” करने का निर्णय ले लिया और दूर-दूर से विद्वानों को निमंत्रण भेजा गया। समय बहुत ही कम था और लक्ष्य बहुत ही बड़ा था। जल-आपूर्ति मात्र दस दिनों की बाकी रह गई थीं। 1 नवम्बर को जप का मुहूर्त निकला था।

तभी बड़ी भारी समस्याओं ने ट्रस्टीयों को घेर लिया। जिन बड़े-बड़े विद्वानों को निमंत्रण भेजा गया था उनमे से अधिकाँश ने आने में असमर्थता व्यक्त कर दी। किसी का स्वास्थ्य खराब था , तो किसी के घर मृत्यु हों गई थी (मरणा-शौच) ; किसी को कुछ तो किसी को कुछ समस्या आ गई।

“वरुण-जाप” लगभग असंभव हों गया !

इधर इन खबरों को अखबार बड़ी प्रमुखता से चटखारे ले-लेकर छापे जा रहे थे और सनातन धर्म , धर्मानुयायियों , ट्रस्टमण्डल और तिरुपति बालाजी का मज़ाक बनाए जा रहे थे। धर्म के शत्रु सनातन धर्म को अंधविश्वास सिद्ध करने पर तुले हुए थे।

ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री प्रसाद साहब की आँखों में आंसू थे। उन्होंने रो-रोकर आर्त ह्रदय से प्रभु वेंकटेश से प्रार्थना की । सारे ट्रस्टी और भक्तों ने भी प्रार्थना की।

सभी ने प्रभु से प्रार्थना की – “क्या वरुण जाप नहीं हों पाएगा? क्या मंदिर के दर्शन बन्द हों जायेंगे? क्या हजारों-लाखों साल की परम्परा लुप्त हों जाएगी?

नवम्बर के महीने में रात्रीविश्राम के लिए मंदिर के पट बंद हों चुके थे । मंदिर में कोई नहीं था। सभी चिंतित भगवद्भक्त अपने-अपने घरों में रो-रोकर प्रभु से प्रार्थना कर रहे थे।

और तभी रात्रि में 1 बजे यह घंटा नाद गूंज उठा पूरे तिरुमला पर्वत पर, मानो प्रभु सबसे कह रहे हो "चिंता मत करो! मैं हूँ तुम्हारे साथ!"

दूसरे दिन सुबह से ही “वरुण जाप” हेतु अनुकूलताएँ मिलनी आरम्भ हों गई। जिन विद्वानों ने आने में असमर्थता व्यक्त कर दी थीं उनकी उपलब्धि के समाचार आने लग गए। 8 नवम्बर को पुनः मुहूर्त निर्धारित कर लिया गया। जो विद्वान् अनुष्ठान से मुंह फेर रहे थे , वे पुरी शक्ति के साथ अनुष्ठान में आ डटे।

“वरुण जाप” तीन दिनों तक चलनेवाली परम् कठिन वैदिक प्रक्रिया हैं । यह प्रातः लगभग तीन बजे आरम्भ हों जाती हैं। इसमें कुछ विद्वानों को तो घंटो छाती तक पुष्करिणी सरोवर में कड़े रहकर “मन्त्र जाप” करने थे , कुछ भगवान् के “अर्चा विग्रहों” का अभिषेक करते थे , कुछ “यज्ञ और होम” करते थे तो कुछ “वेदपाठ” करते थे। तीन दिनों की इस परम् कठिन वैदिक प्रक्रिया के चौथे दिन पूर्णाहुति के रूप में “सहस्त्र कलशाभिषेकम्” सेवा प्रभु “श्री वेंकटेश्वर” को अर्पित की जानेवाली थी।

तीन दिनों का अनुष्ठान संपन्न हुआ। सूर्यनारायण अन्तरिक्ष में पूरे तेज के साथ दैदीप्यमान हों रहे थे। बादलों का नामोनिशान तक नहीं था।

भगवान् के भक्त बुरी तरह से निराश होकर मन ही मन भगवन से अजस्त्र प्रार्थना कर रहे थे।
भगवान् के “अर्चा विग्रहों” को पुष्करिणी सरोवर में स्नान कराकर पुनः श्रीवारी मंदिर में ले जाया जा रहा था।
सेक्युलर पत्रकार चारों ओर खड़े होकर तमाशा देख रहे थे और हंस रहे थे और चारों ओर विधर्मी घेरकर चर्चा कर रहे थे की “ अनुष्ठान से बारिश? ऐसा कहीं होता हैं? कैसा अंधविश्वास हैं यह?“ कैसा पाखण्ड हैं यह?”
ट्रस्ट के अध्यक्ष श्री प्रसाद साहब और ट्रस्टीगण मन ही मन सोच रहे थे की “हमसे कौनसा अपराध हों गया?” , “क्यों प्रभु ने हमारी पुकार अस्वीकार कर दी?” , अब हम संसार को और अपनेआप को क्या मुंह दिखाएँगे?”
इतने में ही दो तीन पानी की बूंदे श्री प्रसाद के माथे पर पड़ी..

उन्हें लगा कि पसीने की बूंदे होंगी और घोर निराशा भरे कदम बढ़ाते रहे मंदिर की ओर पर फिर और पाँच छह मोटी मोटी बूंदे पड़ी!

सर ऊपर उठाकर देखा तो आसमान में काले काले पानी से भरे हुए बादल उमड़ आए है और घनघोर बिजली कड़कड़ा उठी!

दो तीन सेकेण्ड में मूसलधार वर्षा आरम्भ हुई! ऐसी वर्षा की सभी लोगो को भगवान के उत्सव विग्रहों को लेकर मंदिर की ओर दौड़ लगानी पड़ी फिर भी वे सभी सर से पैर तक बुरी तरह से भीग गए थे।

याद रहे, वर्षा केवल तिरुपति के पर्वत क्षेत्र में हुई, आसपास एक बूँद पानी नहीं बरसा। गोगर्भम् जलाशय और आसपास के कुंएं लबालब भरकर बहने लगे। इंजिनियरों ने तुरंत आकर बताया की पूरे वर्ष तक जल-आपूर्ति की कोई चिंता नहीं।

सेक्युलर पत्रकार और धर्म के शत्रुओं के मुंह पर हवाइयां उड़ने लगी और वे बगलें झाँकने लगे। लोगों की आँखें फटी-की-फटी रह गई। भक्तमण्डल जय-जयकार कर उठा।

यह घटना सबके सामने घटित हुई और हज़ारों पत्रकार और प्रत्यक्षदर्शी इसके प्रमाण हैं लेकिन इस बात को दबा दिया गया।[1]

“सनातन धर्म” की इस इतनी बड़ी जीत के किससे कभी टेलीविज़न , सिनेमा अथवा सोशल मीडिया पर नहीं गाये जाते ।

भगवान् वेंकटेश्वर श्रीनिवास कोई मूर्ती नहीं वरन् साक्षात् श्रीमन्नारायण स्वयं हैं। अपने भक्तों की पुकार सुनकर वे आज भी दौड़े चले आते हैं। भक्त ह्रदय से पुकारें तो सही।

“वेंकटाद्री समं स्थानं , ब्रह्माण्डे नास्ति किंचन् ।
श्रीवेंकटेश समो देवों , न भूतो न भविष्यति ।।

🙏 हर हर महादेव 🙏
🙏 ॐ नमो भगवते वासुदेवाय 🙏
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12/08/2022

🌺एकादशी में चावल वजिर्त क्यों?🌺

वर्ष की चौबीसों एकादशियों में चावल न खाने की सलाह दी जाती है। ऐसा माना गया है कि इस दिन चावल खाने से प्राणी रेंगने वाले जीव की योनि में जन्म पाता है, किन्तु द्वादशी को चावल खाने से इस योनि से मुक्ति भी मिल जाती है। एकादशी के विषय में शास्त्र कहते हैं, ‘न विवेकसमो बन्धुर्नैकादश्या: परं व्रतं’ यानी विवेक के सामान कोई बंधु नहीं है और एकादशी से बढ़ कर कोई व्रत नहीं है।
पांच ज्ञान इन्द्रियां, पांच कर्म इन्द्रियां और एक मन, इन ग्यारहों को जो साध ले, वह प्राणी एकादशी के समान पवित्र और दिव्य हो जाता है। एकादशी जगतगुरु विष्णुस्वरुप है, जहां चावल का संबंध जल से है, वहीं जल का संबंध चंद्रमा से है। पांचों ज्ञान इन्द्रियां और पांचों कर्म इन्द्रियों पर मन का ही अधिकार है।

मन ही जीवात्मा का चित्त स्थिर-अस्थिर करता है। मन और श्वेत रंग के स्वामी भी चंद्रमा ही हैं, जो स्वयं जल, रस और भावना के कारक हैं, इसीलिए जलतत्त्व राशि के जातक भावना प्रधान होते हैं, जो अक्सर धोखा खाते हैं।

एकादशी के दिन शरीर में जल की मात्र जितनी कम रहेगी, व्रत पूर्ण करने में उतनी ही अधिक सात्विकता रहेगी। महाभारत काल में वेदों का विस्तार करने वाले भगवान व्यास ने पांडव पुत्र भीम को इसीलिए निर्जला एकादशी (वगैर जल पिए हुए) करने का सुझाव दिया था।

आदिकाल में देवर्षि नारद ने एक हजार वर्ष तक एकादशी का निर्जल व्रत करके नारायण भक्ति प्राप्त की थी। वैष्णव के लिए यह सर्वश्रेष्ठ व्रत है।

चंद्रमा मन को अधिक चलायमान न कर पाएं, इसीलिए व्रती इस दिन चावल खाने से परहेज करते हैं। एक और पौराणिक कथा है कि माता शक्ति के क्रोध से भागते-भागते भयभीत महर्षि मेधा ने अपने योग बल से शरीर छोड़ दिया और उनकी मेधा पृथ्वी में समा गई।

वही मेधा जौ और चावल के रूप में उत्पन्न हुईं। ऐसा माना गया है कि यह घटना एकादशी को घटी थी। यह जौ और चावल महर्षि की ही मेधा शक्ति है, जो जीव हैं। इस दिन चावल खाना महर्षि मेधा के शरीर के छोटे-छोटे मांस के टुकड़े खाने जैसा माना गया है, इसीलिए इस दिन से जौ और चावल को जीवधारी माना गया है।

आज भी जौ और चावल को उत्पन्न होने के लिए मिट्टी की भी जरूत नहीं पड़ती। केवल जल का छींटा मारने से ही ये अंकुरित हो जाते हैं। इनको जीव रूप मानते हुए एकादशी को भोजन के रूप में ग्रहण करने से परहेज किया गया है, ताकि सात्विक रूप से विष्णुस्वरुप एकादशी का व्रत संपन्न हो सके।
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31/07/2022

🌺🌺समुद्र मंथन कहाँ हुआ था?🌺🌺

यदि स्थूल दृष्टि से देखें तो शायद अरब सागर में कहीं। लेकिन ऐसा नहीं है। किसी भी घटना के सही स्थान का पता करने हेतु उस समय की भौगौलिक स्थिति का पता होना भी जरूरी है। ग्रंथों में गहरे घुसेंगे तो पता चलेगा कि बिहार, बंगाल, झारखण्ड, उड़ीसा आदि समुद्र मंथन के समय जलमग्न थे। उत्तर प्रदेश के पूर्वी हिस्से भी उस समय थे नहीं।
समुद्रमंथन का समय भागीरथी के प्रादुर्भाव से भी बहुत पहले का है। उस समय हिमालय से निकलने वाली नदियाँ बहुत थोड़ी ही भूमि का निर्माण कर पाई थी। नदियाँ ही भूमि का निर्माण करती हैं। इस राष्ट्र के पिता पर्वत हैं तो माताएँ नदियाँ। अभी भी सबसे प्रसिद्ध डेल्टा सुंदरवन इसी निर्माण का प्रमाण है।
कथा है कि जब समुद्रमंथन की बात उठी तो मंदार पर्वत की मथानी तो बना ली गई, कूर्मावतार ने आधार भी दे दिया, लेकिन मथानी की रस्सी कहाँ से लाएँ। उस समय सर्वसम्मति बनी कि हिमालय की कंदराओं में आराम कर रहे नागराज वासुकि से ही यह काम करवाया जा सकता है। उनसे बड़ी रस्सी जैसी कोई वस्तु तीनों लोग और चौदहों भुवन में नहीं हैं।
अब समस्या थी कि उन्हें लाए कौन?
इतने बड़े थे कि लहरिया स्टाइल में रेंगते तो टकराने लगते। इसलिये अधिकतर समय आराम ही करते थे। इस पर कैलाशपति उठे और वासुकि को अपनी कलाई में लपेट कर चल दिये। नागराज की डिलीवरी करके भोले एक स्थान पर बैठ गए।
जब मंथन प्रारम्भ हुआ तो नागराज को पीड़ा होने लगी। इधर से देवता खींचें, उधर से असुर खींचें, बीच में मंदराचल चुभे। क्षुब्ध होकर नागराज से फुफकारना शुरू कर दिया। अब सोचिये कि जिस नाग को एक पर्वत के चारों तरफ लपेट दिया गया, वह कितना बड़ा होगा। नागराज के फुफकारने से समस्त सृष्टि में जहर फैलने लगा। हाहाकार मच गया।
एक तरफ तो देवता और असुर भाग खड़े हुए और दूसरी तरह नागराज निढाल होकर फुफकारते रह गए।
अब करें तो करें क्या?
देवताओं की मीटिंग बिठाई गई। प्रश्न उठा कि इस हलाहल को कौन पियेगा?
विष्णु भगवान ने भोले बाबा के चरण धर लिये कि बाबा आप ही पी सकते हैं।
जो भोले होते हैं, उनके हिस्से ही जहर आता है। बाबा उठे और पहले जहर पिया और फिर वासुकि का उपचार किया। तब तक तो धन्वंतरि निकले भी नहीं थे। उनसे भी पुराने वैद्य हैं वैद्यनाथ।
बाबा ने हलाहल पी तो लिया, लेकिन उसका ताप असह्य हो गया। वहीँ एक स्थान देखकर बैठ गए। मंथन शुरू हो गया। मंथन से निकले चन्द्रमा के एक टुकड़े को तोड़ कर निकाला गया और उसे भगवान के सर के ठीक ऊपर स्थापित किया गया। उस टुकड़े से निरंतर शीतल जल महादेव के सर पर गिरता रहता है।
यह क्षेत्र कहाँ है जहाँ मंथन हुआ था?
बिहार के बाँका जिले में स्थित मंदार पर्वत के आसपास का क्षेत्र ही मंथन का स्थान है। आज भी झारखण्ड, बंगाल, उड़ीसा और बिहार की भूमि में खनिजों का प्रचुर भण्डार है। सबका केंद्र मंदार पर्वत ही है। मंदार में अब भी समुद्र मंथन से निकली निधियाँ छिपी हुई हैं।
भोलेनाथ नागराज को पहुँचाने के बाद जिस स्थान पर बैठे थे, वह स्थान है वासुकीनाथ। जिस स्थान पर नागराज का उपचार करने व विष ग्रहण करने के बाद बैठे थे, वह स्थान है वैद्यनाथ धाम, देवघर में। चाँद का वह टुकड़ा जो उनके सर पर लगाया गया था, आज भी लगा है और उससे निरंतर जल टपकता रहता है। वह टुकड़ा भोलेनाथ के ठीक ऊपर मंदिर के शिखर के नीचे लगा है। नाम है - चंद्रकांत मणि।

हर हर महादेव जी
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15/07/2022

🚩🚩बेलपत्र की कहानी🚩🚩
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स्कंद पुराण के अनुसार, एक बार माता पार्वती के पसीने की बूंद मंदराचल पर्वत पर गिर गई और उससे बेल का पेड़ निकल आया। चुंकि माता पार्वती के पसीने से बेल के पेड़ का उद्भव हुआ। अत: इसमें माता पार्वती के सभी रूप बसते हैं। वे पेड़ की जड़ में गिरिजा के स्वरूप में, इसके तनों में माहेश्वरी के स्वरूप में और शाखाओं में दक्षिणायनी व पत्तियों में पार्वती के रूप में रहती हैं।
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फलों में कात्यायनी स्वरूप व फूलों में गौरी स्वरूप निवास करता है। इस सभी रूपों के अलावा, मां लक्ष्मी का रूप समस्त वृक्ष में निवास करता है। बेलपत्र में माता पार्वती का प्रतिबिंब होने के कारण इसे भगवान शिव पर चढ़ाया जाता है। भगवान शिव पर बेल पत्र चढ़ाने से वे प्रसन्न होते हैं और भक्त की मनोकामना पूर्ण करते हैं। जो व्यक्ति किसी तीर्थस्थान पर नहीं जा सकता है अगर वह श्रावण मास में बिल्व के पेड़ के मूल भाग की पूजा करके उसमें जल अर्पित करे तो उसे सभी तीर्थों के दर्शन का पुण्य मिलता है।
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बेल वृक्ष का महत्व-

1. बिल्व वृक्ष के आसपास सांप नहीं आते।
2. अगर किसी की शवयात्रा बिल्व वृक्ष की छाया से होकर गुजरे तो उसका मोक्ष हो जाता है।
3. वायुमंडल में व्याप्त अशुद्धियों को सोखने की क्षमता सबसे ज्यादा बिल्व वृक्ष में होती है।
4. 4, 5, 6 या 7 पत्तों वाले बिल्व पत्रक पाने वाला परम भाग्यशाली और शिव को अर्पण करने से अनंत गुना फल मिलता है
5. बेल वृक्ष को काटने से वंश का नाश होता है और बेल वृक्ष लगाने से वंश की वृद्धि होती है।,🌿🌿🌿🌿🌿
6. सुबह-शाम बेल वृक्ष के दर्शन मात्र से पापों का नाश होता है।
7. बेल वृक्ष को सींचने से पितर तृप्त होते हैं।
8. बेल वृक्ष और सफेद आक को जोड़े से लगाने पर अटूट लक्ष्मी की प्राप्ति होती है।
9. बेलपत्र और ताम्र धातु के एक विशेष प्रयोग से ऋषि मुनि स्वर्ण धातु का उत्पादन करते थे।
10. जीवन में सिर्फ 1 बार और वह भी यदि भूल से भी शिवलिंग पर बेलपत्र चढ़ा दिया हो तो भी उसके सारे पाप मुक्त हो जाते हैं।🌿🌿🌿🌿
11. बेल वृक्ष का रोपण, पोषण और संवर्द्धन करने से महादेव से साक्षात्कार करने का अवश्य लाभ मिलता है।

कृपया बिल्व पत्र का पेड़ जरूर लगाएं। बिल्व पत्र के लिए पेड़ को क्षति न पहुचाएं........
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ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
ॐ नमः शिवाय ॐ नमः शिवाय
🙏ॐ नम: शिवाय🙏
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14/07/2022

देवों के देव महादेव जी का अति प्रिय पावन 'श्रावण मास' आज से प्रारंभ हो रहा है।

सभी #सनातनधर्म_हिंदूधर्म व असंख्य श्रद्धालुओं को हार्दिक बधाई एवं अनंत शुभकामनाएं।

भगवान भोलेनाथ की असीम अनुकंपा हम सभी पर बनी रहे। सम्पूर्ण विश्व का कल्याण हो।

जय भोलेनाथ!
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13/07/2022

गुरु पूर्णिमा / विशेष -
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गुरू पूर्णिमा निराशा की रात में आशा के सवेरे का अहसास कराती है
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राजा- महाराजाओं और धनकुबेरों से भिन्न शक्ति है , गुरुओं और आचार्यों की , परंतु समकालीन युग में गुरुओं की बहुतायत और शिष्यों की कमी होती जा रही है , वहां हम नहीं समझ पाते कि किसे अपना तन मन समर्पण कर दें ? ऐसी बिबूचन का समाधान प्रस्तुत श्लोक में बड़े सुंदर ढंग से किया गया है -
गुरवो बहव: सन्ति शिष्यवित्तोपहारिण: ।
तं एकं शंकरं वन्दे शिष्यसन्तापहारिणम् ।।

अर्थात ऐसे हजारों गुरु हैं जो शिष्यों का धनहरण करते हैं , परंतु इन समस्त गुरुओं से भिन्न एक गुरु शंकर की मैं वन्दना करता हूँ , जो शिष्य के दुखों को दूर करते हैं ।
वर्तमान युग को सूचना क्रांति के विस्फोट का समय कहा जाता है। चौबीसों घंटे देश विदेश के खबरिया और मनोरंजक चैनल वेअंत हर पल शब्द उगल रहे हैं । अन्याय करने वालों का सफाई में "ये"कहना है एवं अन्याय सहने वालों का " वो" कहना है । परंतु विवेक की लौ ठंडी पड़ती जा रही है। जिसके कारण एक जैसे अपराध थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। ज्ञान की आंधी जब जब मन में उमड़ती - घुमड़ती है तो संशय और काल्पनिक भय की दीवारें स्वत: ढह जाती है । आदमी वह नहीं रहता जो था। वह , वह हो जाता है , जो उसे होना चाहिए। बेहतर और बेहतर से भी बेहतर। विश्वामित्र गुरु होने के नाते संसार भर के जब मित्र हैं , हमजोली हैं तो अभिशप्त अहिल्या जड़ पाषाण कैसे रह सकती है । उनकी करुणा से तरल ज्ञान पाकर , भगवान् राम के हाथों उसे पूर्ववत चेतना सम्पन्न कर देते हैं । शंकराचार्य जी का स्त्रोत है -
" चित्रं बटतरोर्मले वृद्धा: शिष्या गुरुयुर्वा....
इस वट वृक्ष के नीचे युवा गुरु और वृद्ध शिष्य आसीन है । युवा गुरु का मौन व्याख्यान चल रहा है , उसी से शिष्यों के संशय और शंकाओं का स्वतः समाधान हो रहा है। क्योंकि वट ही ऐसा एकमात्र वृक्ष है जिसकी जड़ें हवा में झूलते हुए आँखों को जब दिखाई दे रही हैं तो शब्द खर्च करने की क्या जरुरत है। भारतीय मनीषा का मानना है कि जन्म लेते ही संतान पर तीन कर्ज आयद हो जाते हैं - पितृ, देव तथा गुरु, जिसे चुकाने के लिए शिष्य स्वयं गुरु बने और ज्ञान की लाखों वर्ष से बहती धारा के मूलधन में अपना सबाया योगदान करें । आकाश , जल , वायु , अग्निदेव कर्ज हैं इनको चुकाने के लिए इनका सभी समान रूप से उपभोग करें। पितृ कर्ज से हम तभी मुक्त हो सकते हैं , जब हम स्वयं माता-पिता बनें ।
फ्रांस में जब विचारक और दार्शनिक गुरु बालतेयर और रूसो आदि ने राजतंत्र और जनद्रोही सामंतवाद के विरुद्ध चौराहे पर खड़े होकर उसकी निर्रथकता और अप्रासंगिकता पर अट्टाहास किया तो उसकी धमक लुई 16 वें के राजमहल तक पहुंच गई । और राजशाही का खात्मा होते देर न लगी । भारत में भी आचार्य चाणक्य ने सिकंदर के विश्वविजय के सपने कौ धूल चटा दी थी । नि:सन्देह गुरु और शिक्षक आवश्यकता पड़ने पर गुरुकुलों से बाहर निकलकर सामाजित और आर्थिक किरान्ति के सूत्रधार के रूप में जनवाणी को मौके पर अभिव्यक्त करते हैं ।
#सनातन_धर्म_हिन्दू_धर्म
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