08/09/2020
: राज ऋषि पीपा जी व राजपूत समाज।
गागरोन के नरेश कड़वा राव के घर पीपा जी के जन्म के बारे में गागरोन के नरेश कड़वा राव के घर पीपा जी के जन्म के बारे में तेरी विचार को और इतिहासकारों में अलग-अलग मत लिखे हैं। इनमें मैकालिक(15) डॉ. फर्कुहर(16) के अनुसार पीपा जी का जन्म सन 1425, अलेक्जेंडर कनिंघम(17) अनुसार के अनुसार वह 1385 के मध्य डॉ परशुराम चतुर्वेदी के अनुसार सन 1408 वैसा 1418 में माना गया है ।वहीं नाभादास की भक्तमाल में पीपा जी का समय 15 वीं सदी का उत्तरार्ध में व16वीं सदी का पूर्वार्द्ध मना है।(19) नाभादास ने अपनी उक्त कृति पीपा जी को गुरु रामानंद का शिष्य होना वे संत कबीर का समकालीन होना प्रमाणित किया है। अतः इस परिस्थिति में विद्वानों के अनुसार कनिंगम का मत अधिक प्रमाणित हो जाता है इसी आधार पर एवं पीपापंथी क्षत्रिय राजपूत समाज जोधपुर की स्वर्ण मान्यता के अनुसार पीपा जी का जन्म विक्रम संवत 1380 की चैत्र शुक्ल पूर्णिमा बुधवार, उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र के धनलग्न में गागरोन दुर्ग में हुआ था।(20) इसी तिथि सुमंत को बरसों से अधिकृत मानकर विगत 27 वर्षों से उनकी( पीपाजी) जयंती का उत्सव उनके गागरोन क्षेत्र स्थित मंदिर व देश के अन्य स्थलों में बृहद स्तर पर मनाया जाता है। पीपा जी की माता का नाम लक्ष्मीवती बताया जाता है(21) पीपा जी के पिता शाक्तमतानुयायी थे, इसी कारण प्रारंभ में वे भी( पीपाजी) राज्यकाल में शाक्तमतानुयायी थे तथा 'जल्पादेवी' के उपासक थे।(22) पीपाजी को पीपाराव, प्रतापराव अथवा बप्पा जी के नाम से कई इतिहास-ग्रंथौमें उच्चारित किया गया है। अस्त्र शास्त्र और राजकार्य शिक्षा प्राप्ति के सातवें 1360 ई. में गागरोन दुर्ग के शासक बने(23) समय अनुसार उनके बाहर विवाह हुए बताये जाते हैं। जिनमें उनकी 12 रानियों के नाम, किताबे राजस्थान का हवाला इस प्रकार मिलता है।(24) (1) भावनगर (गुजरात) के राजा सेन्द्रक की पुत्री धीरदेवी गोयल(2) पाटण(गुजरात) के राजा रिणधवल की पुत्री अंतरदेवी चावड़ी(3) गिरनार (गुजरात) के राजा भूहड़ की पुत्री भगवतीदेवी चूड़ासमी (4) बाँधगढ़ के राजा बीरमदेव की पूत्री रमादेवी बघेली (5) पाटण के राजा भीजड़ की पुत्री विजयारमण सोलंकनी (6) कनवटगढ़ के राजा यशोधर की पुत्री रंभाकंवर झाली(7) भुज (गुजरात) के राजा विभृ की पुत्री लिक्षमादेवी जाड़ेची (8) मांणसा के राजा कनकसेन की पुत्री विरजाभानु चावड़ी (9)हलवद के राजा वीरभद्र की पुत्री सिंगारदेवी झाली (10) करेगांव के राजा जोजल की कंचनदेवी दहीयाणी(11) कनहरीगढ़ के राजा कनकराज की पुत्री सुशीलदेवी बाघेली एंव (12) टोड़ा (राजपुताना) के राजा हाजा (सोलंकी) की पुत्री सीता सोलंकी। उल्लेखनीय है की पीपाजी के सन्त जीवन की धर्म-यात्राओं में इसी सीता साध्वी रानी का भारी साथ रहा जिनकी कई घटनाएँ भक्तमाल में वर्णित है। प्रताप जन्म से ही वीर,साहसी,धैर्यवान दयालु,परोपकारी थे।फिर आप गागरोन गढ़ के राजगद्दी पर बैठने के बाद फिराजशाह तुगलक ने गागरोन पर हमला करने का प्रयत्न किया। पीपाराव ने इस युद्ध में फिरोजशाह तुगलक को बुरी तरह परास्त किया इस चौहान मुस्लिम युद्ध में अगणित सैनिक मारे गये इन हुतात्माओ के क्षत-विक्षत शव दुर्दशा अवस्था में बिखरे
पड़े थे।कौए, गिद्ध व चीलों कें झुण्ड के झुण्ड इन सैनिको के शव नोच-नोच के खा रहे थे।सारा क्षेत्र खून से लहूलुहान हो गया था(आज भी काली सिंध नदी को इस युद्ध से लाल होना बताया जाता है।)
पीपा न होता जद धरती पे,हिंदवाणो अंधेरो छा जातो।
ई काल कोठरी दा मुख में, ओ सारो देश समा जातो ।।
फिर एक दिन पीपाराव शिकार पर गये और शिकार में हिरणी लाये उसके गर्भ में शिशू था ऐसा फिर एक दिन पीपाराव शिकार पर गये और शिकार में हिरणी लाये उसके गर्भ में शिशू था ऐसा दृश्य देखकर पीपा मन ही मन पस्चाताप कर रहे थे।और राजवैभव व इस असार संसार के प्रति विरागात्मक भावना जाग्रत हुई एंव अहिंसा की भावना मन में आयी। तब पीपाराव की कुल देवी माँ रक्तदन्ता ने दर्शन दिये व् आपको रामानंद स्वामी से ब्रह्म दीक्षा लेकर विष्णु की भक्ति करने का आदेश दिया तब पिपराव राजपाट छोड़कर रामानंद के पास जाकर ब्रह्म दीक्षा ली। यहां कबीरजी के शब्द इस प्रकार है-
ना कबीर के लच्छ्गी,ना कोई मेरे ठाट।
धन पीपा जिन तज दियो,रबियो राज अरु पाट।।
पीपा मन तो बावलों,इसके मत ना लग।
माया का भ्रम छोड़ के,सन्त रे मारग भाग।।
आज धुप में छाव है,काल छांव में धुप।
पीपा पलटया ही करे, रंक रूप अरु भूप।।
जीव मार जीमण करे,खाता करै बखाण।
पीपा परखत देख ले, थाली माय मूसाण।।
पीपा पाप न कीजिये,अलगो रहियो आप।
करणी जासी आपरी,कुण बेटो कुण बाप।।
फिर आपने गुरु आज्ञा से द्वारिपुरी के लिए प्रस्थान किया व वहाँ जकर भगवान का साक्षात् दर्शन चाहा तब मन्दिर के-
पुजारी से पूछे पीपा, कहाँ है मेरा बन्सीवाला।
पुजारी ने पीपा को बताया पानी में है नन्दलाल।।
ऐसा सुनते ही पिपराव व उनकी पत्नी सती सीता दोनों समुद्र में कूद गये तब भगवान ने उनको साक्षात् दर्शन दिये व पीपाराव सात दिन तक समुद्र(द्वारिका) में रहें ।भगवान ने उनको शंख,चक्र,गदा,और पुष्प(तिलक छाप) प्रदान किये व अमृत पिलाया और मानव समाज को पिलाने का आदेश दिया तब प्रताप से पीपा बने:-
कृष्ण चले पहुँचाय के, पीपा उलहयों नीर।
सीता सखी समीप,भिग्ययो नाही चीर ।।
भगवान ने आपको किनारे तक पहुचाया तब मन्दिर क पुजारी व कई लोगो नें आपका स्वागत किया आपने मानव कल्याण के लिये तिलक छाप को मन्दिर में स्थापित कर दिया जो आज भी वैष्णव सन्त महात्माओ के द्वारिका जाने वाले वैष्णव भक्तो की भुजा पर लगायी जाती है फिर एक दिन रामानंद स्वामी ने अपने शिष्यो को स्वतन्त्र पन्थ चलाने व सनातन धर्म का प्रचार करने का आदेश दिया। तब कबीर आदि सन्तों ने मन्दिर मठो के माध्यम से धर्म प्रचार किया। लेकिन पीपाजी ने अपने ही(क्षत्रियसमाज) राजपूतो को संगठित कर अहिंसा का उपदेश दिया व सुई के माध्यम से अपनी आजिविका चलाने व जन-जन तक पहुँचकर सनातन धर्म का प्रचार करने का उपदेश दिया।
दे सुई शस्त्र हाथ बढ़ाया,राजपूतो का मान।
प्रणाम हमारा आपको ,पीपा सतगुरु भगवान।।
लाख मुसीबते सहकर पीपा,ने हमको ज्ञान दिया।
नतमस्तक होकर क्षत्रियों ने, गुरूजी का समान किया।।
मानव समाज व देश हित के लिये क्षत्रिय शिष्यो ने अपने अस्त्र-शस्त्र गुरु महाराज के चरणों में समर्पित कर दिये व गुरु आज्ञा से सिलाई कार्य मानव शरीर को सुरक्षा व सुंदरता प्रदान की पीपाजी का उद्देश्य यहाँ कोई नई जाती बनाया नही है। अहिंसक सैनिक तैयार करके धर्म प्रचार करना है पीपाजी से दीक्षा लेने वाले राजपूत शिष्यो के नाम इस प्रकार है-
दामोदर दास परमार(पंवार),बेरीसाल सोलंकी,पृथ्वीराज तंवर,भीमराज गोयल,हरीदत टाक रणमल चौहान,राजसिंह भाटी,अभयराज यादव,जयदास खींची,अभयराज सांखला,शम्भुदास डाची,राजेंद्र गोड़,हिमपल बाधेला,बरजोग चावड़ा हरदत कच्छावा,मण्डलीक वीरभाण मकवाणा,ईशवदास दईया,वीरभण शेखावत,ब्रिजराज सिंह सिसोदिया हरबन्द राठौर माणकदेव सखेलचा,रावगोकुल देवदत,गोरधनपुरसिंह पंवार, शुधोधन बड़गुर्जर,रिणमल परिहार,आनंददेव गहलोत,भगवानदास झाला,इंदाजी गोयल अमृत कनेरिया दलवीर सिंह राठौर मोहनसिंह इंदा,प्रभात सिंह सिंधु राठौर,दिल्ली का उम्मेदसिंह तंवर,काश्मीर का हेमसिंह कछावाहा,खेड़ का स्वामी गंगदेव गोयल,दिल्ली का दूल्हासिंह टाँक,सुदा का गोपालराव परिहार,चितौड़ का मुलसिंह गहलोत,कन्नौज का पन्नेसिंह राखेचा (राठौड़) मुलराव चावड़ा एंव लोद्र्वा (मारवाड़) के मूलराज भाटी आदि। व् अन्य गोत्रों के राजपूत हिंसा का रास्ता त्याग,पूण्य के पावन-पथ पर कदम बढ़ाते ही चले।कठिन से कठिन परिश्रम क्र अपना जीवन-निर्वाह कर यवनों के आतंकवाद से झुंझने हेतु इन सभी राजपूत अनुयायियों को पीपाजी महाराज ने मोतियो की माला की तरह हार बना सन्गठन बनाया; जिन्होंने यवनों को परास्त किया। क्षत्रिय-सन्गठन-शक्ति से भारत माता की रक्षा कर विजय पताका में लहराई। पीपाजी ने अपने जीवन पर्यन्त क्षत्रियों को ही स्वच्छ,सुदृढ़,व अहिंसक बनने की प्रेरणा दी।राजपूत समाज के बुद्धि जीवियों ने भी पीपाजी को आदर्श(गुरु) मानकर अपनी जाती के आगे पीपा दीक्षित राजपूत लगाना शूरू कर दिया। व आगे जाकर पीपाजी के शिष्यो के परिवारों को कई नामो से पुकारा जाने लगा कोई पीपा पंथी, राजपूत,पीपा वंशी राजपूत,आदि कई नाम होने के कारण समाज के कुछ लोग वास्तविकता से दूर होते चले गये और अपने व्यवसाय सिलाई(दर्जी) को अपनी जाति मानाने लग गये।
जाती के बारे में कई लोग जन्म से व कई लोग कर्म से मानते है लकिन शास्त्रो में जाति का लक्षण इस प्रकार है
जाति शब्द जन धातु से बना है यदि कर्म जाति व्यवस्था होती तो परशुरामजी,श्री द्रोणाचार्य व कई ऐसे वीर क्षत्रिय धर्म का पालन करते हुऐ भी ब्राह्मण कहलाये,वैदेही,जनक ब्रह्मज्ञानी होते हुऐ भी क्षत्रिय ही रहे।इससे यह स्पस्ट होता हैं कि जति वार्यगत है कर्मगत नही।अत:जाति जन्म से ही मानी जाती है इसलिए हम उस दिन भी राजपूत थे और आज भी राजपूत(पीपा दीक्षित)राजपूत हैं।समाज के हर व्यक्ति अपनी जाति राजपूत माने व सिलाई को अपना व्यवसाय माने हम सब कुछ जानते हुए भी भ्रमित नही होवे दर्जी हमारा कर्म है जति नही है। हम उस दिन भी राजपूत थे और आज भी राजपूत हे
जिसको न निज जात,देश का अभिमान है।
वह नर नहीं नीरा,मृतक समान है।।
मंणी न तजे भजंगड़ो,बच्छ न जत तो खीर।
धर्मी न तजे धर्म न,पीपा मछली नीर।।
जाति बदलना शस्त्रो में महापाप माना गया है।
पीपा पाप कियो नहीं,पूण्य कियो सौ बार।
जो काहू को लियो नहीं,तो दियो बार हजार।।
पीपाक्षत्रिय राजपूत समाज में कई लोग व्यवसाय दर्जी को जाति मानाने लगे है जिससे पूरा समाज भ्रमित हो रहा है समाज के सभी लोगो को अपनी जाती पहचान राजपूत ही रखनी चाहिये हमे अतीत के गौरव से प्रेरणा लेकर भविष्य को ध्यान में रखकर वर्तमान को अच्छा व् अहिंसक बनाना है और गुरु महाराज की वाणी का प्रचार करके वास्तविकता बनाये रखना हे 1881 से 1891 की जनगणना में समाज की गणना राजपूत जाति से की गई है एवं 1960 मै अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा ने पीपा क्षत्रिय राजपूत समाज को राजपूत ही माना है व वर्तमान में 2020 में मारवाड़ राजपूत सभा ने और अखिल भारतीय क्षत्रिय महासभा ने राजपूत ही माना है।
जगे जगाये ज्ञान का दीप जलाये हम।
सन्त पीपा की वाणी को जग में फैलाये हम।।
हो गया सो हो गया,सोच करना व्यर्थ है।
गत काल को लौटने में कौन शूरवीर समर्थ है।।
हम क्या थे क्या हो गये,और क्या होंगे अभी।
आओ आज विचार करे हम मिलकर सभी।।
प्रेषक विजय सिंह राठौड़ (राखेचा)